सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अधूरी स्टोरी इन अंग्रेजी

   अधूरी स्टोरी इन अंग्रेजी 

आज तो इंग्लिश स्पीकिंग सीखने जायेंगे | अपनी कक्षा के मित्रों को उछलते हुए मानव बता रहा था | मेरे पापा ने तो कह दिया " जो भी करना है कर ले पर पूरी मेहनत से कर मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं तुझे देने के लिए " यह बात उसने अपने करीबी मित्र प्रकाश से कान में आराम से कही और दोनों कुछ देर के लिए चुप हो गये ||
     मानव दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी  इलाके कहे जाने वाले मंगोल पूरी में रहता है जहाँ एक एक पलंग रखने लायाक छोटे छोटे घरों में नाली के ऊपर तक छज्जा बढ़ा के संरचना बनाइ गई है | जिसकी   तीन -चार मंजिलों में अलग -अलग परिवारों के लगभग १२  से १५  लोग हर २५ गज के टुकड़े पर रहते हैं | 
  अधिकतर परिवार बिहार ,उत्तर प्रदेश ,राजस्थान  आदि राज्यों के अपने बड़े बड़े आँगन छोड़कर मजबूरी वाली स्वेच्छा  से पहले खुद आये और पीछे पीछे पूरा समुदाय ले आये अपना अपना पूरा  गाँव ले आये | ऐसे ही एक परिवार का किशोर बालक है मानव जो यहाँ के सरकारी विद्यालय में पढता है |
 किशोर मन आभाव में भी भाव ढूंढता है और ऐसे परिवेश में जहाँ चारो और खेल से लेकर खाने तक और प्रेम से लेकर पखाने तक हर क्रिया और कर्म के लिए जगह के वैकल्पिक  उपयोग की संस्कृति पनप चुकी हो वहां भी कुछ स्वछंदता  अगर बची रहे तो उसे किशोर मन का ओज ही कहना चाहिए|  खैर मानव आज इतना खुश क्यों था?  वजह थी प्रकाश की बातें जिसने  उसके  मन में  उमंग भर दी थी  | प्रकाश भी उसी बंद जगह का नया उन्मुक्त मन था जिसने नयनो की भाषा की लालसा मानव के मन में डाली थी | प्रकाश को दीप से मोह  हुआ था और उसकी बातें केवल मानव के सामने निकल रही थी दोनों किशोरों ने अपने दस वर्षों के स्कूली सफ़र में किसी लड़की से बात नहीं की थी और अब कुछ तो आसपास माहौल और कुछ आंतरिक परिवर्तन उसे ललचा रहा था जिसका समाधान मानव को करना था | 
तो दोनो मित्र निकल पड़े एक दूसरे की इक्षा  के सम्मान में २५ गज की ही एक कक्षा के लिए जहाँ लगभग  ३० लोग अंग्रेजी सीखने आते होंगे अधिकांश किशोर क्यूंकि यहाँ २ आकर्षण थे एक समाज सापेक्ष एक मन सापेक्ष तो मन के अंकुर ने उस बंजर में भी उपजाऊ भूमि  तलाश ली और शुरू हुई एक प्यारी सी प्रेम कहानी ................
आगे की बात शुरू हुई ......
मेरा नाम मानव है और तुम्हारा ओह्ह सॉरी व्हाट इज यौर नेम ?
रजिया " आज मेरा पहला दिन है " और आपका ?
मेरा भी पहला ही दिन है |
फिर आपको सर ने मेरे साथ क्यों बिठाया है? आप मेरी प्रेक्टिस करा लोगे?
हाँ ये मिनिंग्स ही तो है इतना तो आता है |
आता ही है तो यहाँ क्यों आये हो| ह्ह्हह्ह्हा !
नहीं इतना आता है पूरा नहीं!
अच्छा चलो फिर कराओ अभ्यास यही कहेंगे ना हिंदी में ह्ह्ह्हह!!!
और ऐसी ही बातों में 2 घंटे की क्लास ख़त्म हुई खैर आज मानव पर प्रकाश बहुत घुस्सा था|  उसने पूरे समय एक बार भी दीप से बात नहीं की जिसके लिए प्रकाश उसे यहाँ लाया था |
भाई कल पक्का बिलकुल फिकर नोट तेरा भाई है ना | घंटा है? अपने में लगा था बेटा सब समझ रहा हूँ में
 वो रजिया मोह्मदन है मोहम्दन बच के रहियो | और ऐसी ही बड़ो की सिखाई अर्थहीन समझी जाने वाली गहरी बातें करते हुए दोनों अपने अपने गली को गए |
   आज मानव को केवल" यहाँ क्यों आये हो ?" इसका जवाब ढूंढना  था|  रात हुई चारो ओर अन्धकार के सागर ने अपना पानी उड़ेल दिया पर मानव के मन में बस एक प्रश्न की चिंगारी की आग थी, जो इस सागर में उसे डूबने से बचाए हुई थी | उसे सुबह का नहीं 5 बजने का इन्तजार था शाम के 5 बजने का और वो उसी इन्तजार में सुबह स्कूल भी गया और वहां भी शुरू हुआ किस्सा आने वाली 5 का और जा चुकी 5 का सरकारी स्कूल उसमे भी 8 में से 5 पीरियड खाली बस करने को होता ही क्या ? मानव था प्रकाश था और थी कोचिंग की बातें
 भाई पहले ही दिन पटा ली तूने ?एक बच्चे ने कहा |
दूसरा लड़का - भाई मानव तू इस सब के चक्कर में मत पड़ |
तीसरा - अबे छोड़ ना खुद के बस की है नहीं तो बस कुछ भी चुप भो** के, हाँ भाई! तू बता कैसी है ? ह्म्म्म क्या सब हुआ बेटा?  तू इसीलिए लिए तो गया है नी इंग्लिश तो तुझे खूब आती है सब बेरा है मन्ने |
प्रकाश - अबे चू**!! अब उसे इंग्लिश आती है, पर इंग्लिश आना और बोलना आना अलग अलग है इसीलिए जा रहा है बन्दीबाजी करने नहीं समझा ढक्कन चलो चलो सोमू आ गया | सोमू स्कूल के प्रिंसिपल का नाम था जो बस बच्चे जानते थे सोमू राउंड पर था और अब सब बरामदे से क्लास में |
  स्कूल की बातें मानव को दुविधा में डाले हुए थी क्या करने जा रहा है वो सच में इंग्लिश ...... या खैर मानव को याद आया वो तो दोस्त की मदद करने जा रहा है, इसी बहाने इंग्लिश भी ठीक हो जाएगी और ..... और तो जल्दी से वो प्रकाश का  काम कर कोचिंग  छोड़ देगा क्योंकि पापा ने कहा है ज्यादा पैसे नहीं हैं ? सच में ? हाँ बिलकुल सच !उसे तो इंग्लिश आती है टेन्स तो उसने 8वीं क्लास में ही याद कर लिए थे और वहां यही तो पढ़ाते हैं 2, 4 दिनों की कोई फीस थोड़े ही लगेगी और 5 बज गये नीचे से प्रकाश चिल्ला रहा था मानव ओह्ह भाई ! मानव!
आया !...........

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय और इंदिरा गांधी खुला विश्विद्यालय

यह अनुमान है कि २०२१ तक भाषा रूपांतरण की वैश्विक मांग, इस क्षेत्र के पेशेवर सेवा क्षेत्र का बाजार 560 लाख रु के बराबर या उससे अधिक हो जाएगा।  वैश्विक बाजार में प्रवेश करने के लिए अनुवाद एक महत्वपूर्ण साधन है। वेबसाईट, अलग अलग तरह के अनुबंधों के दस्तावेज, बाजार से सम्बंधित सामग्री, भिन्न डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को प्रयोग करने वाले व्यक्ति सभी के लिए अनुवाद ही एकमात्र विकल्प है कि वह नए क्षेत्रों से और नए बाजार से जुड़ें।     अनुवाद को केवल अनुवाद या दो भाषाओं का परिवर्तन समझेंगे तो यह बहुत कठिन लगेगा, लेकिन इसे अन्य विज्ञान की तरह विज्ञान समझेंगे तो यह सरल होगा। वैश्विक संदर्भ में योरोपीय संघ और भिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इस विषय पर काम और शोध के क्षेत्र को विस्तारित किया है। भारतीय संदर्भ में अनुवाद परिषद और भाषा वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग इस क्षेत्र में कार्यरत्त हैं। कुछ बिंदु जिन पर कई तरह की भ्रांतियां हैं उसी के संदर्भ में मेरा यह लेख है आशा है इससे एक नया संवाद धरातल हिंदी भाषियों के बीच तैयार होगा।  अनुवादकों को मातृभाषी होना चाहिए  ब्रांड की वैश्व...

अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मुख पर जाभी

अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मुख पर जाभी मूलभूत अधिकारों के केंद्र में स्वयं को व्यक्त करने का अधिकार है, जिसका अर्थ है उन्मुक्त अभिव्यक्ति, परन्तु मानव के मुक्त अभिव्यक्ति का अधिकार केवल बोलने का अधिकार नहीं है| हम सभी स्वयं को विभिन्न तरीके से व्यक्त करते हैं| एक बच्चा जब तक बोलना नहीं सीखता तब तक अपनी भूख और अन्य आवश्यकताओं को रोकर व्यक्त करता है| आपके वस्त्र भी आपके व्यक्तित्व को व्यक्त करतें हैं| व्यक्ति के व्यक्तित्व के अपने गुण-धर्म होते हैं जो उसे व्यक्त करतें हैं| विरोध का प्रत्येक स्वर अभिव्यक्ति को जाहिर करता है | अभिव्यक्ति की संस्कृति में व्यक्तिगत लक्षण, सामुदायिक पहचान और शायद राष्ट्रवादियों की प्रथा एवं हम क्या खाते हैं सब समाहित है| बोलकर हम केवल अपने भावों का और विचारों का संवाद करते हैं, उस समय की इक्षा के गुण- धर्म को व्यक्त करते हैं| ऐसी अभिव्यक्ति संक्रमणकाल  की अभिव्यक्ति होती है, जो आंशिक अभिव्यक्ति है स्वयं को उन्मुक्त होकर व्यक्त करना हीं मूलभूत और आवश्यक व्यक्तिगत अधिकार है| यह निश्चित तौर पर सचेत होकर विचार करने का विषय है कि अभिव्यक्ति किसी के लिए ह...

तालाबंदी से नाकेबंदी तक सहयोग से सवाल तक

अभी हम सब घर पर बैठे-बैठे तरह-तरह के भावों से भरे हुए हैं। भय, क्रोध, चिंता अनिश्चित्ता के माहौल में हम सरकार के सहयोग और सरकार के खिलाफ़ होने के तौर पर फिर बंट रहे हैं। कुछ लोग मोदी के फैसले लेने के समय और योजना का गुणगान कर रहे हैं कुछ मीन मेख निकाल कर योजना और समय की आलोचना कर रहे हैं। एक बात जिस पर हम सब सहमत हैं वो ये कि हम सब सामान्य स्थिति में नहीं हैं और इस आसामन्य स्थिति में हमें एक दूसरे के सहयोग की जरुरत है। मजदूर वर्ग की त्रासदी के प्रति सरकार को तालाबंदी करने से पहले एक बार सोचना चाहिए था? हमारा आर्थिक स्वभाव जब असंगठित क्षेत्र पर ही आधारित है, जब आपके पास इसकी पूरी सूचना है की हमारे अर्थतंत्र में दैनिक तौर से कमाई कर खाने वाले लोगों की हिस्सेदारी ज्यादा है!! जब आपको पता है कि आपने ही वादा किया है कि २०२२ तक आप सबको घर देंगे? तो ऐसे में तालाबंदी लगाने के प्रयोजन के पीछे के मनोविज्ञान पर सवाल बनता है! और ये सवाल यकीन मानिये देश हित के खिलाफ नहीं है! गलती कहाँ हो रही है? एक राष्ट्र के तौर पर हम परिसंघीय व्यवस्था में काम करते हैं, जैसे हमारा मीडिया मोडिया हो गया...