सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मुख पर जाभी

अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मुख पर जाभी
मूलभूत अधिकारों के केंद्र में स्वयं को व्यक्त करने का अधिकार है, जिसका अर्थ है उन्मुक्त अभिव्यक्ति, परन्तु मानव के मुक्त अभिव्यक्ति का अधिकार केवल बोलने का अधिकार नहीं है|
हम सभी स्वयं को विभिन्न तरीके से व्यक्त करते हैं| एक बच्चा जब तक बोलना नहीं सीखता तब तक अपनी भूख और अन्य आवश्यकताओं को रोकर व्यक्त करता है| आपके वस्त्र भी आपके व्यक्तित्व को व्यक्त करतें हैं| व्यक्ति के व्यक्तित्व के अपने गुण-धर्म होते हैं जो उसे व्यक्त करतें हैं| विरोध का प्रत्येक स्वर अभिव्यक्ति को जाहिर करता है |
अभिव्यक्ति की संस्कृति में व्यक्तिगत लक्षण, सामुदायिक पहचान और शायद राष्ट्रवादियों की प्रथा एवं हम क्या खाते हैं सब समाहित है| बोलकर हम केवल अपने भावों का और विचारों का संवाद करते हैं, उस समय की इक्षा के गुण- धर्म को व्यक्त करते हैं| ऐसी अभिव्यक्ति संक्रमणकाल  की अभिव्यक्ति होती है, जो आंशिक अभिव्यक्ति है स्वयं को उन्मुक्त होकर व्यक्त करना हीं मूलभूत और आवश्यक व्यक्तिगत अधिकार है| यह निश्चित तौर पर सचेत होकर विचार करने का विषय है कि अभिव्यक्ति किसी के लिए हानिकारक या किसी की अवमानना के लिए न हो और न ही किसी संवैधानिक नियम का उल्लंघन करें |
चिंता का विषय
चिंता करने का पहला विषय है ऐसी स्थापनाएं जो विवाद को जन्म देतीं हैं और वास्तविक राष्ट्रीय मुद्दों से ध्यान भटकाती हैं, जैसे गौरक्षा के लिए किसी को मारना, एंटी रोमियो दल जो लड़कियों को छेड़खानी से बचाने की लिए हुआ पर उसका असर हम सब जानते हैं, लव- जिहाद, स्वनियोजित राष्ट्रवादियों का इन सब मुद्दों पर मतभेद रखने वालों को, कश्मीर पर सरकार की आलोचना करने वालों को राष्ट्र विरोधी या पाकिस्तान जाने के लिए कहना सब केवल मुद्दे उछालना है ताकि वास्तविक समस्या छुपी रहे|
मै क्या खाता हूँ यह मेरी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है| यह मेरी पहचान का हिस्सा है| साथ में यह मेरी इक्षा है कि मै क्या खाऊं? और इस पर यदि कोई नियम का उल्लंघन नहीं हो रहा है, तो यह बिलकुल उचित है| अपने इक्षा की पूर्ती करना व्यक्तिगत अधिकार है| और इक्षा की पूर्ती के अधिकार को कोई भी पूर्व निर्धारित ढंग से नहीं रोक सकता| अभी हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने जो पशुवध- विक्रय निषेध क़ानून पेश किया है वह विस्मय में डालता है| इस नियम को पशु पर क्रूरता  निषेध (पशुधन बाजार नियमन अधिनियम २०१७) के अंतर्गत एक अधिसूचना जारी कर आना चाहिए था|
 नए नियम के अंतर्गत चुस्त बैल, बैल, भैंस, गाय, बछिया, बधिया बैल, बछड़ों, और ऊंट को बिना लिखित सूचना के नहीं बेचा जा सकता और लिखित में प्रत्येक बाजार समिति को यह देना है कि इसका विक्रय कृषि सम्बन्धी कार्य के लिए हो रहा है न कि कसाईघर के लिए| इस नियम के अनुसार यह सूचना छ; महीने तक संग्रहित करना अनिवार्य है| इस कारण केंद्र सरकार राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप तो करेगी ही अपितु इसे नियम के अनुसार उचित भी करार देगी|
     ऐसे नियम सबसे पहले तो पशु क्रूरता निषेध अधिनियम १९६० के दायरे से बहुत दूर है| क्योंकि यह नियम पशुवध पर रोक नहीं लगाता और इस नियम के के अंतर्गत ऐसा कोई नियम थोपा भी नहीं जा सकता| दूसरी बात यह कि अनुच्छेद 19(छ)g किसी को भी कोई भी पेशा अपनाने की आजादी देता है | यह उनका मूलभूत अधिकार है| और यह अधिकार तब तक है जब तक यह किसी नियम को तोड़ता न हो या राज्य उस कार्य को अपने अधिकार क्षेत्र में न ले| इस नियम के आने के बाद पशुधन विक्रय सवैंधानिक दृष्टि में संदिग्ध हो जायेगा|
अंतिम बात एक पशु की दैवीय विधान में दी जाने वाली बलि धार्मिक विधान में कुर्बानी क्या मूलभूत अधिकार के अंतर्गत नहीं आते बिलकुल आते हैं और यह सब अभिवयक्ति के अधिकार का हिस्सा है| यह निर्णय एक मनमान और अतार्किक निर्णय है कि गैरदुधारू पशुओं का वध नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका असर अनेक किसान के जीविकोपार्जन पर पड़ेगा|
प्रतिकूल प्रभाव
सरकार को मांस व्यापार में लगे २२ लाख लोगों के रोजगार की कोई चिंता नहीं है| साथ ही किसान का कष्ट जो बढेगा सो अलग क्योंकि एक गैरआर्थिक पशु के रखरखाव में सालाना औसत ४०,०००रु लगते हैं जो एक छोटे और मझौले किसान के लिए बहुत बड़ी राशि है| कुल मांस उत्पादन में अभी  पशुधन का ५% भैंस का २३% तथा ४६% मुर्ग्गी से आता है| इस नियम की परिभाषा के अनुसार २८% उत्पादन स्रोत पर इसका असर पड़ेगा| वर्ष २०१४ में भारत ने ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए विश्व में पशुमांस निर्यात में शीर्षस्थान प्राप्त किया और कुल ४ अरब डॉलर की मात्रा का निर्यात किया| इस नियम से चमड़ा उद्योग पर भी असर पड़ेगा| अप्रैल – दिसंबर २०१६ में मांस निर्यात १३% कम हो चुका है| जो अभी और कम होगा|
पशुचर्म और हड्डी का प्रयोग केवल चमड़ेउद्योग में ही नहीं होता अपितु साबुन निर्माण, दन्तपेस्ट, बटन, पेंटब्रश, शल्यचिकित्सा में टाँके, औषधि, वाध्य-यंत्र, आदि उद्योग में भी होता है| भारत का चमड़ा उद्योग विश्व के चमड़ेउद्योग का १२% है|
भारत विश्व में पदत्राण उद्योग (फुट वियर) का ९% उत्पादन करता है|  अब यदि पशु वध नहीं किया जाना है तो उनकी देखभाल की आवश्यकता है| और इससे पशु मालिकों पर ३०००रु का अतिरिक्त मासिक भार पड़ेगा| इससे भी अधिक और भयावह स्थिति पशुधन और कृषि के मिश्रित व्यवस्था वाली कृषि की होगी| आर्थिक सर्वेक्षण २०१५-१६ के अनुसार पशुधन किसानों को सूखे एवं बेरोजगारी के दिनों में धन उपलब्ध कराता है| राज्य भी उनसे पशुवध के लिए पशु खरीदते हैं| जिसमें भैंसों की संख्या 6.2 करोड़ थी| नए नियम के अनुसार अब दोनों ही बाजार से कोई ऐसा क्रय विक्रय नहीं कर सकते है|
चुनावी कारण
सरकार का इसमें कोई निर्णय तर्क पर आधारित नहीं है| उनका उद्द्शेय केवल धार्मिक चिमनी को जलाए रखना है ताकि गाय का मसला चलता रहे| जनता के बीच चर्चा के लिए अन्य मुद्दे न आयें| जनता का भावुक शोषण हो और बहुमत को उत्तेजित कर वोट लिया जा सके| व्यापार, उपभोग, रोजगार, यह सब प्रतिकूल अवस्था में ही रहें और असली मुद्दे जनता की भावना पर हलके पड़ते रहें| इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी इसी मुद्दे पर चिल्ला रहा है और इसे तवज्जो दे रहा है|
चारों ओर अशांति है, स्वघोषित पहरेदार यह सब स्थिरभाव से देख रहा है| इन मुद्दों पर स्पष्ट स्थिति देने में उसकी सरकार का गला बैठ गया है इसीलिए| ये सरकार दूसरों के अभिव्यक्ति के अधिकार के मुख पर भी जाभी लगा रही है|
19 जून 2017 सोमवार  

द हिन्दू , कपिल सिब्बल(कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्र मंत्री एवं जाने मान अधिवक्ता ) के लेख का अनुवाद              

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कोरोना से धर्म की बातें

पूरी दुनिया कोरोना से बचाव और संघर्ष में है। हमें अपने इस नये शत्रु से संवाद करना चाहिए! ये बहुत सी ऐसी बातें समझा रहा है जिसे यदि हमने नहीं समझा तो ये फिर आएगा हमें जतलाने की “बॉस यू आर नोट द बॉस” तुम हिन्दू हो, मुस्लिम हो, ईसाई हो, अमेरिकी हो चीनी हो तुम अन्तरिक्ष मापी हो, तुम ईश्वर के जनक हो पर तुम बॉस नहीं हो!! विज्ञान की परिभाषा के अनुसार कोरोना एक अदना सा प्रोटीन अणु है जो शरीर में आकर जैविक परिवर्तन से सक्रिय हो जाता है। पर हमें विज्ञान से क्या हम तो अल्लाह की कयामत और ईसा का शाप ही मानेगें। जब पूरी दुनिया की सत्ताएं पहली बार मन्दिर मस्जिद की सीमाओं को सही समझ चुकि हैं, जिस समय परमार्थ के लिए नैतिकता ही काफी है किसी धर्म का दंड नहीं ऐसे में सोशल मीडिया पर मुर्खता की सभी हदें पार करती हुई न जाने कैसी कैसी बातें आपको देखने को मिल जायेंगी। कुछ लोग कहेंगे ऐसे लोग हर दौर में होते हैं! बस यही समझना है हमें कि हमें हर दौर से आगे बढ़ के सोचना होगा। कोरोना ने हमें हमारी हैसियत याद दिलाई है। हमें हमेशा यह याद रखने के लिए कहा है कि जब जीवन आपसे शुरू नहीं हुआ तो आप पर ही खत्म कैसे ह...

तर्क की प्रसुप्ति का दौर

सोनू निगम ने १६ अप्रैल को तीन ट्विट किये जिनमें एक धर्म विशेष की प्रार्थना पद्धति  पर सवाल था और सवाल भी समस्या की मुद्रा में था| ऐसा सवाल जो तटस्थ रूप से सभी धर्मों के हुल्लड़बाजी और पर्वों में बढ़ते शोर शराबे की प्रकृति  पर था| तीन ट्वीट की श्रृंखला को सम्पूर्णता से देंखे तो ये सवाल धर्म की आंतरिक पवित्रता की अपेक्षा उसके बाह्य कर्मकांड पर था|      जितना मैं धर्म को समझ पाया हूँ यह मुझे आंतरिक शांति प्राप्त करने का व्यक्तिगत साधन ही लगा है जिसे हम सामूहिकता के दायरे में विवेचित करते रहें हैं| लोगों ने इस पर तमाम तरह की विभिन्न प्रतिक्रियाएं दी जिनमे सोनू निगम के राजनीतिक मौका परस्ती का भाव और इस्लाम को लक्षित करने की सहजता के समय को लेकर ही बहुमत ने अपना पक्ष रखा | यहाँ मुद्दा ये नहीं  है कि सोनू निगम ने इस्लाम को ही लक्षित क्यों किया ट्वीट की श्रृंखला में अन्य धर्मों की चर्चा तो है ही साथ ही ये सोशल मीडिया की प्रवृति पर लोकतंत्र की वास्तविक वयस्कता को लेकर भी है आज हम जब सामाजिक संजाल तंत्र के युग में हैं जहाँ सब किसी भी विषय पर अपनी प्रतिक्...