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नाम

कुछ आभास और एहसास का अंतर है ये कविता नहीं विमर्श का मन्त्र है ये 






नाम का क्या है कोई भी संग रख लो 
जिसका मन है वही संगकर लो 
संगिनी तो कोई है नहीं 
खुश रहने के लिए संग का ढोंग कोई भी धर लो 
नाम तो एक आभास है 
साथ तो एक एहसास है
एहसास को जीना है, अगर नाम से ही हमारे
तो आभास का संग तुम भी धर लो
सुना है दिल्ली में सियासत बहुत है
चलो तुम भी खुश होकर कुछ कर लो
हम तो पेट की भूख में उलझे हैं
तुम प्यार की बात कर लो
नाम का क्या है कोई भी संग धर लो''

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